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जब अहंकार श्रीकृष्ण को बाँधना चाहता था !

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महाभारत में एक ऐसा प्रसंग आता है, जब दुर्योधन ने श्रीकृष्ण को बंदी बनाने का प्रयास किया। दुर्योधन को लगा कि सत्ता, सेना और राजशक्ति के बल पर वह श्रीकृष्ण को भी अपने नियंत्रण में ले सकता है। लेकिन श्रीकृष्ण मुस्कुराए। यही मुस्कान इस प्रसंग को केवल महाभारत की घटना नहीं रहने देती, बल्कि इसे हमारे अपने भीतर की यात्रा का प्रतीक बना देती है। दुर्योधन ने कृष्ण को बाँधना चाहा दुर्योधन के भीतर का विश्वास था— “मेरे पास सत्ता है, मेरे पास शक्ति है, इसलिए मैं परिस्थितियों और लोगों को अपने अनुसार नियंत्रित कर सकता हूँ।” यही अहंकार की मूल प्रवृत्ति है। अहंकार कहता है— “सब कुछ मेरे नियंत्रण में होना चाहिए।” जबकि कृष्ण का स्वरूप हमें इसके बिल्कुल विपरीत सत्य की ओर ले जाता है। राजसभा क्या दर्शाती है? इस प्रसंग की राजसभा को हम अपने बाहरी संसार का प्रतीक मान सकते हैं। यह वही संसार है जहाँ मनुष्य अक्सर— पद के पीछे भागता है, प्रतिष्ठा चाहता है, दूसरों पर अपना प्रभाव जमाना चाहता है, अपनी बात मनवाना चाहता है, और परिस्थितियों को अपने नियंत्रण में रखने की कोशिश करता है। लेकिन जीवन हमेशा हमारे अनुसार न...

प्रकृति से ब्रह्मांड तक — आखिर सब कहाँ समा जाता है?

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प्रकृति से ब्रह्मांड तक — आखिर सब कहाँ समा जाता है? हम अक्सर प्रकृति को अलग-अलग हिस्सों में देखते हैं। एक छोटा-सा बीज… एक पेड़… उस पेड़ पर रहने वाली गिलहरी… गिलहरी को अपना भोजन बनाने वाला कोई दूसरा जीव… धरती… सूर्य… आकाशगंगा… और फिर अनंत ब्रह्मांड। लेकिन अगर इन सबको एक साथ देखा जाए, तो एक अद्भुत बात सामने आती है— क्या इस संसार में वास्तव में कुछ भी पूरी तरह अलग है? शायद प्रकृति की सबसे बड़ी कहानी यही है कि हर अस्तित्व किसी न किसी बड़े अस्तित्व का हिस्सा बनता जाता है। 🥜 एक छोटे से Nut से शुरू होने वाली कहानी कल्पना कीजिए, जंगल की जमीन पर एक छोटा-सा Nut पड़ा है। एक गिलहरी आती है और उसे खा जाती है। अब वह Nut अलग अस्तित्व नहीं रहा। उसकी ऊर्जा गिलहरी के शरीर का हिस्सा बन गई। यानी जो चीज हमें अलग दिखाई दे रही थी, वह किसी दूसरे जीवन का हिस्सा बन चुकी है। लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। 🐿️ गिलहरी भी किसी और का हिस्सा बनती है जंगल में हर जीव अपने आप में पूरी कहानी नहीं है। गिलहरी किसी दूसरे जीव के लिए भोजन बन सकती है। वह ऊर्जा आगे किसी और जीव के शरीर का हिस्सा बन सकती है। फिर वही ऊर्जा ...

गणेश विसर्जन: मूर्ति का नहीं, हमारे मोह और अहंकार का विसर्जन

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गणेश विसर्जन: मूर्ति का नहीं, हमारे मोह और अहंकार का विसर्जन “गणपति बप्पा मोरया… अगले बरस तू जल्दी आ!” गणेश उत्सव के दिनों में यह आवाज़ वातावरण को भक्तिमय बना देती है। घरों और पंडालों में गणपति आते हैं, उनकी पूजा होती है, आरती होती है, प्रसाद बाँटा जाता है और चारों ओर उत्सव का माहौल बन जाता है। लेकिन फिर एक दिन वही गणेश जी, जिन्हें हमने इतने प्रेम से अपने घर बुलाया था, उन्हें विदा करने का समय आ जाता है। विसर्जन। मन में एक अजीब-सा भाव होता है—उत्सव भी है और विदाई का दुःख भी। लेकिन क्या गणेश विसर्जन केवल एक धार्मिक परंपरा है? या इसके पीछे हमारे जीवन के लिए कोई गहरा आध्यात्मिक संदेश भी छिपा है? गणेश जी का आना क्या कहता है? हम गणेश जी की मूर्ति घर लाते हैं। मिट्टी से बनी उस प्रतिमा को हम भगवान का स्वरूप मानकर पूजते हैं। उनके सामने दीप जलाते हैं, फूल चढ़ाते हैं, मोदक अर्पित करते हैं और अपनी इच्छाएँ तथा परेशानियाँ उनके सामने रख देते हैं। लेकिन एक क्षण के लिए सोचिए— जिस मूर्ति को हम अपने हाथों से घर लाते हैं, वह हमें क्या सिखाने आई है? शायद यही कि ईश्वर को अपने जीवन में स्थान देना केवल प...

हमारे भीतर का रावण-एक आध्यात्मिक अर्थ !

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  क्या रामायण केवल त्रेता युग की कथा है, या हमारे भीतर भी हर दिन कुछ ऐसा घट रहा है? हम रामायण सुनते हैं तो हमारे सामने एक अद्भुत कथा आती है—श्रीराम, माता सीता, रावण और हनुमान जी की। लेकिन कभी-कभी मन में एक प्रश्न उठता है— क्या इस कथा को हम अपने भीतर घट रही एक यात्रा की तरह भी देख सकते हैं? अगर इसे एक आध्यात्मिक रूपक की तरह देखें, तो लंका केवल बाहर की लंका नहीं रह जाती। रावण केवल एक ऐतिहासिक या पौराणिक पात्र नहीं रह जाता। सीता केवल एक पात्र नहीं रह जातीं और हनुमान जी केवल एक महान भक्त के रूप में ही सीमित नहीं रहते। तब यह पूरी कथा हमारे अपने मन, बुद्धि, अहंकार और ईश्वर से संबंध की कहानी बन जाती है। हमारे भीतर भी एक रावण है रावण की सबसे बड़ी पहचान केवल उसकी शक्ति नहीं थी। उसका सबसे बड़ा संकट था— अहंकार। जब मनुष्य अपने ज्ञान, शक्ति, धन, पद, सफलता या अपनी इच्छाओं को ही अपना अंतिम सत्य मानने लगता है, तब उसके भीतर भी एक रावण जन्म लेने लगता है। अहंकार कहता है— “मैं ही कर्ता हूँ।” “मेरे सामने कौन है?” “मुझे किसी की आवश्यकता नहीं।” यही वह अवस्था है, जहाँ मनुष्य धीरे-धीरे उ...

Hanuman Ansh की कहानी: भक्ति, अनुशासन और सफलता का सफर

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  जब भक्ति बनी संकल्प की शक्ति: Hanuman Ansh   हम सब इस जीवन में केवल निमित्त हैं। जैसे ईश्वर अपनी असीम चेतना से हमें अलग-अलग भूमिकाएँ सौंपता है, वैसे ही हर इंसान किसी बड़े उद्देश्य का हिस्सा बन सकता है। कोई साधन बनता है, कोई मार्गदर्शक और कोई सहायक। तकनीक भी इसी नियम का पालन करती है—वह स्वयं लक्ष्य नहीं है, बल्कि हमारे कर्मों को गति देने वाला एक साधन है। कभी-कभी जीवन में कोई ऐसा अवसर आता है, जब एक सामान्य-सा दिखाई देने वाला व्यक्ति किसी असाधारण कार्य का माध्यम बन जाता है। 21 वर्ष की अनुप्रिया नगर की कहानी कुछ ऐसी ही दिखाई देती है। अर्थशास्त्र की पढ़ाई से फिल्म निर्माण तक पहुँची अनुप्रिया ने Hanuman Ansh के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। फिल्म ने आगे चलकर भारतीय बॉक्स ऑफिस पर ऐसी सफलता हासिल की, जिसकी शायद किसी ने शुरुआत में कल्पना नहीं की थी। लेकिन Hanuman Ansh की कहानी केवल ₹2 करोड़ से ₹70 करोड़ से अधिक की कमाई की कहानी नहीं है। यह कहानी है आस्था, अनुशासन, सेवा, धैर्य और सही उद्देश्य के साथ किए गए कर्म की। और शायद इसी कारण यह फिल्म केवल एक फिल्म न रहकर एक विचार बन...

ब्रह्मांड से बड़ा हमारा मन !

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  मुझे कभी ध्यान ही नहीं आया कि यह ब्रह्मांड कितना बड़ा है। जरा सोचिए… जिस पृथ्वी पर हम रहते हैं, उस पर हमारी अपनी जगह क्या है? शायद समुद्र में तैरते किसी छोटे-से बुलबुले जितनी। अब इसी पृथ्वी की तुलना पूरे सौरमंडल से कीजिए। हमारी स्थिति शायद फिर उसी बुलबुले जैसी ही लगेगी। और फिर सोचिए कि एक आकाशगंगा में कितने तारे और कितने सौरमंडल हो सकते हैं। उसके बाद इस पूरे ब्रह्मांड में मौजूद असंख्य आकाशगंगाओं की कल्पना कीजिए। तब हमारी तुलना करना ही मुश्किल हो जाता है। इतने विशाल ब्रह्मांड में हमारा अस्तित्व कितना छोटा है! लेकिन मजेदार बात यह है कि इसी छोटे-से अस्तित्व को अपनी समस्या पूरी दुनिया की सबसे बड़ी समस्या लगती है। है न, थोड़ी पागलपन जैसी बात? हमारे 250 ग्राम के दिमाग में कितना बड़ा संसार है! जरा अपने मन के अंदर झांककर देखिए। एक तरफ मैं हूँ और मेरे चारों तरफ फैली यह वास्तविक दुनिया। दूसरी तरफ वह दुनिया है, जो मैंने अपने मन में बना रखी है। फिर अतीत की यादें हैं—क्या हुआ, किसने क्या कहा, मैंने क्या किया, मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था, उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया… फिर भविष्य की चिंता है—आग...

कर्म बड़ा है या स्वार्थ?

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  प्रिय दोस्तों, मैंने भगवद्गीता को बहुत बार पढ़ा है। खास बात यह है कि हर बार इसके मायने मुझे चौंका देते हैं। जितनी बार पढ़ता हूँ, उतना ही इसे जानने का जुनून बढ़ता जाता है। शब्दों में शायद मैं इसे पूरी तरह समझा न पाऊँ, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण की जो छवि मेरे मन में बनती है, वह अतुलनीय है। अलग-अलग जगहों पर, कोट्स में, ज्ञान-चर्चाओं और प्रवचनों में हमने बहुत सुना है— “कर्म करो और फल की चिंता मत करो।” यह भी सुनते हैं कि जो निस्वार्थ भाव से कर्म करता है, भगवान उसके कार्य पूरे कर देते हैं। तो क्या इसका अर्थ यह है कि भगवान श्रीकृष्ण की राह पर चलें, अच्छे कर्म करें और फिर हमें सब कुछ प्राप्त हो जाएगा? फिर सवाल उठता है— कर्म करना, फल पाना, फल की चिंता न करना और निस्वार्थ रहना—आखिर इस पूरे रहस्य को समझें कैसे? इसी सवाल का एक बहुत गहरा उत्तर भगवद्गीता के तीसरे अध्याय के 22वें श्लोक में मिलता है। श्रीकृष्ण कहते हैं—मुझे कुछ प्राप्त करना बाकी नहीं श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं— “न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन। नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥” अर्थात्— “हे पार्थ! तीनों लोकों में...