ब्रह्मांड इतना बड़ा है ?
मुझे कभी ध्यान ही नहीं आया कि यह ब्रह्मांड कितना बड़ा है। जरा सोचिए… जिस पृथ्वी पर हम रहते हैं, उस पर हमारी अपनी जगह क्या है? शायद समुद्र में तैरते किसी छोटे-से बुलबुले जितनी। अब इसी पृथ्वी की तुलना पूरे सौरमंडल से कीजिए। हमारी स्थिति शायद फिर उसी बुलबुले जैसी ही लगेगी। और फिर सोचिए कि एक आकाशगंगा में कितने तारे और कितने सौरमंडल हो सकते हैं। उसके बाद इस पूरे ब्रह्मांड में मौजूद असंख्य आकाशगंगाओं की कल्पना कीजिए। तब हमारी तुलना करना ही मुश्किल हो जाता है। इतने विशाल ब्रह्मांड में हमारा अस्तित्व कितना छोटा है! लेकिन मजेदार बात यह है कि इसी छोटे-से अस्तित्व को अपनी समस्या पूरी दुनिया की सबसे बड़ी समस्या लगती है। है न, थोड़ी पागलपन जैसी बात? हमारे 250 ग्राम के दिमाग में कितना बड़ा संसार है! जरा अपने मन के अंदर झांककर देखिए। एक तरफ मैं हूँ और मेरे चारों तरफ फैली यह वास्तविक दुनिया। दूसरी तरफ वह दुनिया है, जो मैंने अपने मन में बना रखी है। फिर अतीत की यादें हैं—क्या हुआ, किसने क्या कहा, मैंने क्या किया, मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था, उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया… फिर भविष्य की चिंता है—आग...