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जीवन है या भूलभुलैया?

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  शास्त्रों से मौन तक की यात्रा भूमिका शायद अपनी जीवन यात्रा में हम सबने कभी न कभी किसी शास्त्र का पाठ किया है—चाहे पाठशाला में, घर के पूजा-पाठ में, या गुरुकुल में। शास्त्रों ने हमें धर्म, कर्म, भक्ति और ज्ञान के विविध मार्ग दिखाए हैं। परंतु अंततः हर साधक का प्रश्न यही रहता है: सत्य क्या है? शास्त्रों का उद्देश्य शास्त्र मार्गदर्शन देते हैं, दिशा दिखाते हैं। वे जीवन के नैतिक और आध्यात्मिक नियमों को समझाते हैं। हर ग्रंथ अपने दृष्टिकोण से मुक्ति का मार्ग बताता है। भिन्नताएँ और भ्रम भगवद गीता कर्म और धर्म पर बल देती है। अष्टावक्र गीता अद्वैत और आत्मज्ञान की ओर ले जाती है। जपुजी साहिब ईश्वर की एकता और नाम सिमरन पर केंद्रित है। धम्मपद सजगता और करुणा का मार्ग दिखाता है। इन भिन्नताओं से साधक कभी-कभी भ्रमित हो जाता है। परंतु यह भ्रम भी साधना का हिस्सा है—क्योंकि यह साधक को भीतर झाँकने के लिए प्रेरित करता है। मौन का मार्ग अंततः सभी शास्त्र मौन की ओर संकेत करते हैं। मौन का अर्थ है भीतर की चंचलता को शांत करना। मौन में ही सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव होता है। मौन की कठिनाई मौन सरल दिखता है, पर टिकन...

कितनी जरुरी है ये कहानी ?

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  नमस्ते दोस्तों! क्या आपने कभी सोचा है कि रामायण या महाभारत जैसी महाकाव्यों को आज भी करोड़ों लोग क्यों पढ़ते और सुनते हैं? सिर्फ़ मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि उनके गहरे संदेशों के लिए। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब हम कहानी के पात्रों को फॉलो करने लगते हैं और उसके जीवन का असली मर्म भूल जाते हैं। आज इस ब्लॉग में हम बात करेंगे कहानी के मर्म की—पात्रों के पीछे छिपे उस सार की, जो आपके जीवन को बदल सकता है। आइए, समझते हैं कैसे! कहानी का मूल मंत्र:  मनुष्य को समझाना आसान है, बस उसके हृदय को छूना ज़रूरी है। यही कारण है कि हर युग में ज्ञान को कहानियों के रूप में परोसा गया, लेकिन अफ़सोस! लोगों ने पात्रों को फॉलो करना शुरू कर दिया और कहानी के मर्म को जीना भूल गए। राम का उद्देश्य: मर्यादा को जीवन में उतारना। कृष्ण का संदेश: कर्म और समर्पण को समझना। पैग़म्बर का संदेश: इंसानियत और इंसाफ को जीना। हमें कहानियों से समझना चाहिए की, उनके पीछे छिपा संदेश ही असली ताकत है। गणित और जीवन: समझो विधि कल्पना कीजिए, गणित के किसी सवाल में आप सिर्फ़ उत्तर रट लें। अगला नया सवाल आए तो क्या होगा? कुछ नहीं! ल...

सबसे बड़ी समस्या?

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 🌸 "मैं" की समाप्ति और "राम" की प्राप्ति 🌸 प्रस्तावना जीवन में सबसे बड़ा बंधन है—"मैं" और "मेरा"। यही अहंकार और ममता हमें दुखों में उलझाए रखते हैं। रामायण का एक प्रसंग हमें यह गूढ़ सत्य सरलता से समझाता है। कथा का प्रसंग वनवास और रावण-वध के बाद जब श्रीराम अयोध्या लौटे, तो पूरा नगर आनंद में डूबा था। परंतु राजमाता कैकेयी अपराधबोध से व्याकुल थीं। उन्होंने राम से आत्मज्ञान का मार्ग माँगा। राम ने उन्हें सीधे उपदेश न देकर एक अद्भुत अनुभव कराया । भेड़ों का उपदेश श्रीराम ने लक्ष्मण को बुलाया और आदेश दिया, "लक्ष्मण! कल प्रात:काल माता कैकेयी को नगर के बाहर सरयू तट पर ले जाना। वहां जहां भेड़ें (sheep) चरती हैं, वहां माता को खड़ा करना और भेड़ों के मुख से थोड़ा 'उपदेश' सुनवाकर वापस ले आना।" सरयू तट पर खड़ी कैकेयी ने जब भेड़ों की आवाज़ को ध्यान से सुना, तो उन्हें प्रतीत हुआ कि वे निरंतर "मैं-मैं" कह रही हैं। तभी उनके भीतर का पर्दा गिरा और उन्हें समझ आया— • भेड़ जीवन भर "मैं-मैं" करती है, पर अंत में काल का ग्रास बन जाती है।...

“क्या सिर्फ मेहनत ही सफलता की कुंजी है?

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  हमारे जीवन में सबसे बड़ी बाधा अक्सर असफलता नहीं होती, बल्कि असफलता का डर होता है। यही डर हमें प्रतियोगिता में उतरने से रोकता है, नए अवसरों को अपनाने से रोकता है, और हमारी क्षमता को सीमित कर देता है। डर क्यों रोकता है? • डर हमें भविष्य की नकारात्मक कल्पनाओं में बाँध देता है। • यह हमें पहला कदम उठाने से रोकता है। • डर के कारण हम उन अवसरों को खो देते हैं, जहाँ जीत की संभावना मौजूद होती है। सफलता को चुनना • सफलता का मार्ग तभी खुलता है जब हम साहस के साथ पहला कदम रखते हैं। • इच्छा और प्रयास मिलकर डर को पराजित करते हैं। • सफलता चुनना मतलब है — अपने सपनों को प्राथमिकता देना और असफलता को सीख मानकर आगे बढ़ना। विजय का रहस्य जब हम डर को छोड़ देते हैं और सफलता को चुनते हैं, तो विजय स्वयं हमारे कदमों में आकर ठहर जाती है। एकलव्य की कहानी तो तुम्हें याद ही होगी  एकलव्य एक आदिवासी बालक था, जिसे धनुर्विद्या सीखने की तीव्र इच्छा थी। उसने गुरु द्रोणाचार्य को अपना आदर्श माना, लेकिन द्रोणाचार्य ने उसे शिष्य बनाने से मना कर दिया। फिर भी, एकलव्य ने मिट्टी की मूर्ति बनाकर उसे गुरु मान लि...

महाभारत की अनसुनी कथा

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क्या आप जानते हैं ? जब 18 दिनों तक चलने वाला महाभारत-युद्ध जब समाप्त हुआ तो नियम के अनुसार पहिले सारथी उतरता है, और फिर सवार। लेकिन उस दिन श्री कृष्ण ने अर्जुन को पहले उतरने को कहा। जैसे ही कृष्ण स्वयं उतरे और हनुमान (ध्वजा पर विराजमान) अंतर्धान हुए, रथ धधककर जल उठा।  अर्जुन ने तब घबराकर श्री कृष्ण की और देखा तो श्री कृष्ण ने कहा, "हे अर्जुन! यह रथ तो भीष्म, द्रोण और विशेषकर कर्ण के दिव्यास्त्रों से बहुत पहले नष्ट हो चुका था। मेरी शक्ति और हनुमान की उपस्थिति से ही यह मेरे संकल्प पर चल रहा था।" इससे अर्जुन का अहंकार मिटा, जो कर्ण पर विजय पाने से हो गया था। आध्यात्मिक अर्थ 1. ईश्वर की कृपा ही रक्षा है      • रथ का नष्ट होना यह दर्शाता है कि मनुष्य का शरीर और साधन केवल ईश्वर की शक्ति से ही सुरक्षित रहते हैं।      • जब तक कृष्ण सारथी हैं और हनुमान ध्वज पर हैं, तब तक कोई भी दिव्यास्त्र हानि नहीं कर सकता। 2. अहंकार का त्याग      • अर्जुन को पहले उतरने को कहना यह संकेत है कि साधक को पहले अपने अहंकार और "मैं" भाव से उतरना चाहिए। ...

क्या है हमारे जीवन की सबसे बड़ी चुनौती?

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प्रस्तावना हमारे जीवन की सबसे बड़ी चुनौती कोई बाहरी शत्रु नहीं है, बल्कि भीतर का भ्रम (confusion) है। जब मन उलझा रहता है, तो निर्णय गलत हो जाते हैं, संघर्ष बढ़ जाते हैं और शांति खो जाती है। निर्णय और संघर्ष – गीता का मनोविज्ञान 1. प्रस्तावना - जीवन में सबसे बड़ी चुनौती: confusion - गीता का महत्व: केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन का विज्ञान 2. भ्रम और निर्णय - भ्रम (confusion) से मुक्त होना ही पहला कदम - स्पष्टता (clarity) के बिना हर निर्णय गलत दिशा में ले जाता है - “निर्णय छोटा हो या बड़ा, clarity ज़रूरी है” 3. लंबी लड़ाई का जाल - अनावश्यक संघर्ष और विवाद जीवन को उलझाते हैं - लंबी जंग छेड़ना = ऊर्जा और समय की बर्बादी - गीता का संदेश: संघर्ष से बचो, साक्षी भाव अपनाओ साक्षी भाव का अर्थ साक्षी भाव का मतलब है अपने विचारों और भावनाओं को देखने वाला बनना। • यह कायरता नहीं है, बल्कि साहस है। • साक्षी भाव में रहकर हम निर्णय से भागते नहीं, बल्कि उसे शुद्ध करते हैं। • परिवार, समाज और कार्यस्थल में भी साक्षी भाव हमें भावनाओं से ऊपर उठकर स्पष्टता देता है। 👉 “निर्णय से भागना कायरता है, निर...

माया के जाल से निकलकर जागृति तक का सफर

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 तुम्हें भी लगता है न, कि सब कुछ तुम्हारे हाथ में है? जीवन में हम अक्सर यही सोचते हैं—'मैं ही करूँगा, मैं ही कर्ता हूँ।' लेकिन जब चीजें उल्टी पड़ जाती हैं, तब माया का पर्दा खुलता है। अचानक झटका लगता है, अहंकार चूर-चूर हो जाता है। यही वो पल है जब जागृति की चिंगारी जलती है। चलो, एक सच्चे उदाहरण से समझते हैं कि असल में क्या करना है। रोज़ की ज़िंदगी का वो उदाहरण—छुट्टी का प्लान फेल! कल्पना करो: तुम्हारी कंपनी में साल की छुट्टियाँ पड़ी हैं। नकद नहीं मिलेगा, तो सोचा—'शनिवार को छुट्टी ले लूँ, रविवार आराम। मेरा हक़ है न!' टिकट बुक, प्लान रेडी। लेकिन रविवार सुबह बॉस का कॉल: 'आज ऑफिस आना पड़ेगा, इमरजेंसी है।' मन में क्या होता है? गुस्सा: 'क्यों मेरे साथ ऐसा?' खिन्नता: 'मेरा प्लान बर्बाद!' दुख: 'सब व्यर्थ गया।' यहाँ कर्म का भ्रम पकड़ा जाता है। तुमने छुट्टी लिया (कर्म), लेकिन रविवार का कॉल तुम्हारे कंट्रोल में नहीं था। सोचो—अगर तुम्हें पता होता कि बॉस कॉल करेगा, तो शायद प्लान ही न बनाते। यही माया है, जो हमें 'कर्ता' का भ्रम देती है। ज्ञान क्य...