संदेश

सबसे बड़ी समस्या?

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 🌸 "मैं" की समाप्ति और "राम" की प्राप्ति 🌸 प्रस्तावना जीवन में सबसे बड़ा बंधन है—"मैं" और "मेरा"। यही अहंकार और ममता हमें दुखों में उलझाए रखते हैं। रामायण का एक प्रसंग हमें यह गूढ़ सत्य सरलता से समझाता है। कथा का प्रसंग वनवास और रावण-वध के बाद जब श्रीराम अयोध्या लौटे, तो पूरा नगर आनंद में डूबा था। परंतु राजमाता कैकेयी अपराधबोध से व्याकुल थीं। उन्होंने राम से आत्मज्ञान का मार्ग माँगा। राम ने उन्हें सीधे उपदेश न देकर एक अद्भुत अनुभव कराया । भेड़ों का उपदेश श्रीराम ने लक्ष्मण को बुलाया और आदेश दिया, "लक्ष्मण! कल प्रात:काल माता कैकेयी को नगर के बाहर सरयू तट पर ले जाना। वहां जहां भेड़ें (sheep) चरती हैं, वहां माता को खड़ा करना और भेड़ों के मुख से थोड़ा 'उपदेश' सुनवाकर वापस ले आना।" सरयू तट पर खड़ी कैकेयी ने जब भेड़ों की आवाज़ को ध्यान से सुना, तो उन्हें प्रतीत हुआ कि वे निरंतर "मैं-मैं" कह रही हैं। तभी उनके भीतर का पर्दा गिरा और उन्हें समझ आया— • भेड़ जीवन भर "मैं-मैं" करती है, पर अंत में काल का ग्रास बन जाती है।...

“क्या सिर्फ मेहनत ही सफलता की कुंजी है?

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  हमारे जीवन में सबसे बड़ी बाधा अक्सर असफलता नहीं होती, बल्कि असफलता का डर होता है। यही डर हमें प्रतियोगिता में उतरने से रोकता है, नए अवसरों को अपनाने से रोकता है, और हमारी क्षमता को सीमित कर देता है। डर क्यों रोकता है? • डर हमें भविष्य की नकारात्मक कल्पनाओं में बाँध देता है। • यह हमें पहला कदम उठाने से रोकता है। • डर के कारण हम उन अवसरों को खो देते हैं, जहाँ जीत की संभावना मौजूद होती है। सफलता को चुनना • सफलता का मार्ग तभी खुलता है जब हम साहस के साथ पहला कदम रखते हैं। • इच्छा और प्रयास मिलकर डर को पराजित करते हैं। • सफलता चुनना मतलब है — अपने सपनों को प्राथमिकता देना और असफलता को सीख मानकर आगे बढ़ना। विजय का रहस्य जब हम डर को छोड़ देते हैं और सफलता को चुनते हैं, तो विजय स्वयं हमारे कदमों में आकर ठहर जाती है। एकलव्य की कहानी तो तुम्हें याद ही होगी  एकलव्य एक आदिवासी बालक था, जिसे धनुर्विद्या सीखने की तीव्र इच्छा थी। उसने गुरु द्रोणाचार्य को अपना आदर्श माना, लेकिन द्रोणाचार्य ने उसे शिष्य बनाने से मना कर दिया। फिर भी, एकलव्य ने मिट्टी की मूर्ति बनाकर उसे गुरु मान लि...

महाभारत की अनसुनी कथा

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क्या आप जानते हैं ? जब 18 दिनों तक चलने वाला महाभारत-युद्ध जब समाप्त हुआ तो नियम के अनुसार पहिले सारथी उतरता है, और फिर सवार। लेकिन उस दिन श्री कृष्ण ने अर्जुन को पहले उतरने को कहा। जैसे ही कृष्ण स्वयं उतरे और हनुमान (ध्वजा पर विराजमान) अंतर्धान हुए, रथ धधककर जल उठा।  अर्जुन ने तब घबराकर श्री कृष्ण की और देखा तो श्री कृष्ण ने कहा, "हे अर्जुन! यह रथ तो भीष्म, द्रोण और विशेषकर कर्ण के दिव्यास्त्रों से बहुत पहले नष्ट हो चुका था। मेरी शक्ति और हनुमान की उपस्थिति से ही यह मेरे संकल्प पर चल रहा था।" इससे अर्जुन का अहंकार मिटा, जो कर्ण पर विजय पाने से हो गया था। आध्यात्मिक अर्थ 1. ईश्वर की कृपा ही रक्षा है      • रथ का नष्ट होना यह दर्शाता है कि मनुष्य का शरीर और साधन केवल ईश्वर की शक्ति से ही सुरक्षित रहते हैं।      • जब तक कृष्ण सारथी हैं और हनुमान ध्वज पर हैं, तब तक कोई भी दिव्यास्त्र हानि नहीं कर सकता। 2. अहंकार का त्याग      • अर्जुन को पहले उतरने को कहना यह संकेत है कि साधक को पहले अपने अहंकार और "मैं" भाव से उतरना चाहिए। ...

क्या है हमारे जीवन की सबसे बड़ी चुनौती?

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प्रस्तावना हमारे जीवन की सबसे बड़ी चुनौती कोई बाहरी शत्रु नहीं है, बल्कि भीतर का भ्रम (confusion) है। जब मन उलझा रहता है, तो निर्णय गलत हो जाते हैं, संघर्ष बढ़ जाते हैं और शांति खो जाती है। निर्णय और संघर्ष – गीता का मनोविज्ञान 1. प्रस्तावना - जीवन में सबसे बड़ी चुनौती: confusion - गीता का महत्व: केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन का विज्ञान 2. भ्रम और निर्णय - भ्रम (confusion) से मुक्त होना ही पहला कदम - स्पष्टता (clarity) के बिना हर निर्णय गलत दिशा में ले जाता है - “निर्णय छोटा हो या बड़ा, clarity ज़रूरी है” 3. लंबी लड़ाई का जाल - अनावश्यक संघर्ष और विवाद जीवन को उलझाते हैं - लंबी जंग छेड़ना = ऊर्जा और समय की बर्बादी - गीता का संदेश: संघर्ष से बचो, साक्षी भाव अपनाओ साक्षी भाव का अर्थ साक्षी भाव का मतलब है अपने विचारों और भावनाओं को देखने वाला बनना। • यह कायरता नहीं है, बल्कि साहस है। • साक्षी भाव में रहकर हम निर्णय से भागते नहीं, बल्कि उसे शुद्ध करते हैं। • परिवार, समाज और कार्यस्थल में भी साक्षी भाव हमें भावनाओं से ऊपर उठकर स्पष्टता देता है। 👉 “निर्णय से भागना कायरता है, निर...

माया के जाल से निकलकर जागृति तक का सफर

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 तुम्हें भी लगता है न, कि सब कुछ तुम्हारे हाथ में है? जीवन में हम अक्सर यही सोचते हैं—'मैं ही करूँगा, मैं ही कर्ता हूँ।' लेकिन जब चीजें उल्टी पड़ जाती हैं, तब माया का पर्दा खुलता है। अचानक झटका लगता है, अहंकार चूर-चूर हो जाता है। यही वो पल है जब जागृति की चिंगारी जलती है। चलो, एक सच्चे उदाहरण से समझते हैं कि असल में क्या करना है। रोज़ की ज़िंदगी का वो उदाहरण—छुट्टी का प्लान फेल! कल्पना करो: तुम्हारी कंपनी में साल की छुट्टियाँ पड़ी हैं। नकद नहीं मिलेगा, तो सोचा—'शनिवार को छुट्टी ले लूँ, रविवार आराम। मेरा हक़ है न!' टिकट बुक, प्लान रेडी। लेकिन रविवार सुबह बॉस का कॉल: 'आज ऑफिस आना पड़ेगा, इमरजेंसी है।' मन में क्या होता है? गुस्सा: 'क्यों मेरे साथ ऐसा?' खिन्नता: 'मेरा प्लान बर्बाद!' दुख: 'सब व्यर्थ गया।' यहाँ कर्म का भ्रम पकड़ा जाता है। तुमने छुट्टी लिया (कर्म), लेकिन रविवार का कॉल तुम्हारे कंट्रोल में नहीं था। सोचो—अगर तुम्हें पता होता कि बॉस कॉल करेगा, तो शायद प्लान ही न बनाते। यही माया है, जो हमें 'कर्ता' का भ्रम देती है। ज्ञान क्य...

From Loneliness to Ocean of Compassion

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  "नमस्कार दोस्तों, अब तक Manav Jagruti के पिछले ब्लॉग्स में हमने यह समझा कि इस संसार को बिना किसी दुvidhā, डर, चिंता और बाधा के कैसे जिया जा सकता है। हमने जाना कि हमारी ज़िन्दगी का उद्देश्य केवल खाना-पीना और संघर्ष नहीं है, बल्कि मानवता का धर्म है—अपने सही उद्देश्य की नाव में सवार होकर उस महा-सागर को पार करना जिसे लोग आध्यात्मिक ज्ञान कहते हैं। आज हम उसी यात्रा के अगले पड़ाव की ओर बढ़ेंगे—जहाँ व्यक्तिगत अनुभव सामूहिक ऊर्जा में बदलता है, और अकेलेपन की चुनौती करुणा व प्रेम के महासागर में विलीन हो जाती है। यह पड़ाव हमें दिखाता है कि जागरण केवल व्यक्तिगत साधना नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना का उत्सव है।" 1. Inner Energy Awakens जैसे-जैसे साधक आध्यात्मिक यात्रा में आगे बढ़ता है, भीतर एक नई energy जन्म लेती है—उत्साह, गहरी शांति और सुख का अनुभव। यह अनुभव उसे और गहराई में उतरने के लिए प्रेरित करता है। 2. Attraction Towards Collective Awakening इस सुखद स्थिति को बढ़ाने के लिए व्यक्ति ध्यान शिविर, सत्संग या digital communities की ओर आकर्षित होता है। यहाँ उसे समान विचारधारा वाले लोग मिलते ...

क्या आप जानते हैं कि आपकी सबसे बड़ी परेशानी क्या है?

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  हम अक्सर सोचते हैं कि हमें जीवन में इतनी परेशानियों का सामना क्यों करना पड़ता है। क्या इसका कारण सिर्फ पैसा, शिक्षा या सुविधाओं की कमी है? लेकिन सच्चाई यह है कि कई बार पर्याप्त सुविधाओं और धन के बावजूद लोग खुश रहते हैं, और कम पढ़े-लिखे लोग भी गहरी संतुष्टि का अनुभव करते हैं। इसका मतलब है कि समस्या बाहरी चीज़ों में नहीं, बल्कि हमारे दृष्टिकोण और सोच में है। असली समस्या हम अपनी गलतियों को पहचानने के बजाय दूसरों में कमियाँ ढूँढ़ते हैं। हम कभी अपने व्यवहार और जीवनशैली का विश्लेषण नहीं करते। अच्छे-बुरे परिस्थितियों को मापने के हमारे मानदंड ही तनाव का कारण बनते हैं। यही हमारी तनावपूर्ण जीवन की मुख्य समस्या है। समाधान के नुस्खे 1. स्वयं का विश्लेषण (Self-Reflection) रोज़ाना कुछ मिनट अपने व्यवहार और आदतों पर विचार करें। खुद से पूछें: आज मैंने कहाँ गलती की? कहाँ सुधार की गुंजाइश है? 2. दृष्टिकोण बदलना परिस्थितियाँ हमेशा अच्छी या बुरी नहीं होतीं, हम उन्हें कैसे देखते हैं वही मायने रखता है। 3. तुलना छोड़ना दूसरों से तुलना करने पर हीनता या अहंकार दोनों पैदा होते हैं। अपनी यात्रा और प्रगति पर...