आप सही कर रहे हैं… या सिर्फ खुद को सही मान रहे हैं?
जब धर्म समझकर की गई भूल का एहसास होता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है — भीष्म पितामह से सीखें जीवन का सबसे बड़ा सबक क्या कभी ऐसा हो सकता है कि हम पूरी ईमानदारी से अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हों, हमें पूरा विश्वास हो कि हम सही रास्ते पर हैं, लेकिन समय बीतने के बाद पता चले कि हमारे निर्णयों ने हमें धर्म से दूर कर दिया? यह प्रश्न सुनने में जितना सरल लगता है, जीवन में उतना ही गहरा है। कई बार हम अपने संस्कारों, वचनों, परिवार की परंपराओं और पुरखों के आदर्शों को निभाने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि यह विचार करना ही भूल जाते हैं कि आज की परिस्थिति में हमारा निर्णय वास्तव में उचित भी है या नहीं। महाभारत में भीष्म पितामह का जीवन हमें इसी गंभीर प्रश्न के सामने खड़ा करता है। भीष्म पितामह: त्याग की महानता और निर्णयों की दुविधा भीष्म पितामह का मूल नाम देवव्रत था। वे अपने पिता राजा शांतनु से अत्यंत प्रेम करते थे। जब उनके पिता सत्यवती से विवाह करना चाहते थे, तब देवव्रत ने अपने पिता की इच्छा पूरी करने के लिए राजसिंहासन का अधिकार त्याग दिया और आजीवन ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा ली। उनका त्याग ...