“ध्यान: संघर्ष या सहज खेल?
Doston , इस ब्लॉग की शुरुआत एक प्रश्न से करते हैं: क्या आपने कभी ध्यान लगाने का प्रयास किया है? क्या आपको लगता है कि यह एक जटिल प्रक्रिया है? लेकिन क्यों? मन की चंचलता मन का स्वभाव ही चंचल है। जहाँ उसे टिकाना चाहो, वहीं से भाग जाता है। यही कारण है कि आज भी बहुत से साधक कहते हैं, “हमारा ध्यान नहीं लगता।” लेकिन सच तो यह है कि हर कल्पना, हर visualization, ध्यान ही है। मेरे पापा अक्सर कहा करते थे: “ध्यान से कर।” उस समय मुझे पता नहीं था कि ध्यान क्या होता है। लेकिन आज समझ आता है कि जो भी करो, उसे 100% concentration के साथ करो। बचपन का अनुभव सच कहूँ तो मैं भी इस कठिनाई से गुज़रा हूँ। लेकिन आज मुझे महसूस होता है कि बचपन में हम सबने “Mungeri Lal” की तरह बहुत से सपने सजाए थे — कभी भविष्य की कल्पनाएँ, कभी अपनी ही दुनिया बना लेना। उस समय हमें पता नहीं था कि हम वास्तव में ध्यान कर रहे हैं। वो बस एक खेल था — आँखें खुली, मन कहीं और, और हम अपनी ही कल्पनाओं में खोए हुए। फर्क सिर्फ़ इतना है कि बचपन में हम इसे खेल समझते थे, और बड़े होकर इसे साधना मान लेते हैं। Brahma Kumari का अनुभव जब मैंने 2021...