यदि सम्पूर्ण होना है तो… श्रीकृष्ण के इस वैराग्य ज्ञान को समझो l
पूर्णता ही हमारा वास्तविक लक्ष्य है l चाहे हम कर्ममार्ग पर चलें, भक्तिमार्ग पर या ज्ञानमार्ग पर, साधना का उद्देश्य आधे-अधूरे मन से चलते रहना नहीं, बल्कि अपने मार्ग में पूर्णता को प्राप्त करना है। कर्ममार्ग : कर्म करते-करते कर्म में इतने तल्लीन हो जाएँ कि अहंकार, फल की आसक्ति और कर्तापन की भावना कम होती जाए। भक्तिमार्ग : भक्ति करते-करते स्वयं को परमात्मा के प्रति पूर्णतः समर्पित कर दें। यहाँ तक कि अपनी इच्छा से अधिक प्रभु की इच्छा प्रिय हो जाए। ज्ञानमार्ग : सत्य का ऐसा बोध हो जाए कि अज्ञान से उत्पन्न भ्रम, मिथ्या पहचान और बंधन समाप्त होने लगें। तीनों मार्गों की साधना अलग हो सकती है, लेकिन एकनिष्ठता, आंतरिक शुद्धि और अहंकार से मुक्ति तीनों में महत्त्वपूर्ण हैं। फिर वैराग्य क्या है? वैराग्य को अक्सर संसार त्यागने, जंगल में कुटिया बनाने या परिवार से दूर हो जाने के रूप में समझा जाता है। लेकिन वैराग्य का वास्तविक अर्थ इससे कहीं अधिक गहरा है। वैराग्य का अर्थ है—विषयों, इच्छाओं और बाहरी परिस्थितियों के प्रति ऐसी अनासक्ति, जिसमें वे आपके मन और विवेक पर अपना अधिकार न जमा सकें। उदा...