"Tu Hi Tu" vs "Main Hi Main" – Spiritual Vibes
दोस्तों, आज बात करते हैं उसी सवाल की जिस पर द्वापर युग से लेकर आज तक चर्चा चल रही है – परमात्मा को पाने का सबसे आसान रास्ता कौन‑सा है? भक्ति वाला मार्ग हो या ज्ञान वाला मार्ग, ज़्यादातर लोग यही सोचते हैं कि किस पर चलकर सफलता मिलेगी। मेरा मानना है कि चाहे मार्ग भक्ति का हो या ज्ञान का, मंज़िल तो एक ही है – उसी अकेले परमात्मा तक पहुँचना। अंतर सिर्फ दृष्टि का है। चलो, थोड़ा गहराई से देखते हैं। भक्ति मार्ग में “तू ही तू” का अनुभव होता है। साधक अपना अस्तित्व मिटा देता है और हर जगह सिर्फ अपने भगवान को ही देखता है। यहाँ अहंकार का विलय हो जाता है और शरणागति ही साधना बन जाती है। पूरी तरह surrender करना, जैसे कह रहा हो – “तू ही सब कुछ है, मैं कुछ नहीं।” जबकि ज्ञान मार्ग में “मैं ही मैं” का अनुभव होता है। लेकिन यह “मैं” व्यक्तिगत अहंकार नहीं है, बल्कि वही चेतना है जो सब में व्याप्त है। इस मार्ग में परमात्मा को उसी चेतना के रूप में देखा जाता है जो हर जगह फैली हुई है – शरीर के अंदर भी और बाहर भी। जो चेतना है, वही सबका आधार है। गीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा था – “सब कुछ करते हुए भी मैं ...