“ज्ञान और कर्म से महान भारत”
भगवद् गीता अध्याय 3, श्लोक 26 में श्रीकृष्ण कहते हैं: “ज्ञानीजन अज्ञानी की श्रद्धा को न तोड़ें, बल्कि स्वयं कर्म करते हुए उन्हें भी प्रेरित करें।” इसका अर्थ है कि आत्मज्ञानी व्यक्ति को चाहिए कि वह दूसरों को भ्रमित न करे, बल्कि अपने आचरण से उन्हें सही मार्ग दिखाए। ज्ञान का उद्देश्य केवल आत्मकल्याण नहीं, बल्कि लोकसंग्रह — यानी समाज का कल्याण है। 🌿 भारत की महानता का रहस्य भारतवर्ष की महानता सदियों से ज्ञान और कर्म के संगम में रही है। ऋषि‑मुनि आत्मज्ञान में स्थित होकर भी यज्ञ और कर्म करते रहे। राजा जनक आत्मज्ञानी होते हुए भी राजकर्म निभाते रहे। श्रीकृष्ण स्वयं कर्मयोग का उपदेश देते हुए समाज को दिशा देते रहे। 👉 यही कारण है कि भारत केवल एक देश नहीं, बल्कि धर्म और ज्ञान की भूमि कहलाता है। 🌸 आज की स्थिति आज बहुत लोग धर्म और ज्ञान को व्यापार बना चुके हैं। “अपनी दुकानें सजाने” के लिए वे ज्ञान को दिखावे और लाभ का साधन बना लेते हैं। परंतु गीता का संदेश स्पष्ट है — ज्ञान का उद्देश्य लाभ नहीं, बल्कि लोककल्याण है। 💫 आधुनिक भारत के लिए संदेश अगर आज के ज्ञानी, नेता और शिक्षक इस श्लोक की भाव...